एक बार फिर जम्मू कश्मीर को बवाल का मौका मिल गया है। वहां उपद्रवी तत्त्व हमेशा मौके की तलाश में रहते है, बात चाहे अमरनाथ बोर्ड को ज़मीं देने की हो या उससे वापस लेने की बावलियों को तो बस बवाल काटने का मौका मिलना चाहिए। पहले ज़मीं देने पर फिर ज़मीं वापस लेने पर।
मज़े की बात है की विरोध का तरीका एक है चाहे वो पहले हो या बाद में वही आगज़नी, वही तोड़ फोड़, वही हिंसक झड़प। बवाल का मौका बदल गया विषय बदल गया पर न तो तरीका बदला न ही चेहरे बदले। एसा लगता है कि हर जगह कुछ आपराधिक लोगों कि भीड़ सिर्फ़ मौके कि तलाश में रहती है और जैसे ही मौका मिला उपद्रव शुरू कर देती है। कश्मीर वैसे ही सेंसिटिव जगह है ऊपर से ये सब बवाल उसे तंग करने के लाइट काफी हैं।
समझना चाहिए बीजेपी और एसी पार्टियों को कि हिंसा कि समस्या का समाधान नहीं है और इससे कभी जी हाँ कभी किसी बात का हल नहीं निकला। बात चीत और मिल बैठकर समस्या का समाधान निकलें बजाये लोगों कि भावना भड़काने के
जय लोकतंत्र की
जय भारत की
Sunday, August 17, 2008
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